इतिहास एवं धरोहर

चौबीसा ब्राह्मणों की
उत्पत्ति एवं इतिहास

गुजरात की पावन भूमि से उत्पन्न, मालवा-मेवाड़ में पल्लवित और सम्पूर्ण भारत में विस्तृत — चौबीसा ब्राह्मण समाज की गौरवशाली धरोहर का विस्तृत वर्णन।

लेखक: हरिशंकर पाण्डेय विशारद
संवत् १९९२
होल्कर राज्य, मालवा
अध्याय ०१

उत्पत्ति का परिचय

चौबीसा ब्राह्मण भारत की प्राचीनतम और गौरवशाली ब्राह्मण परंपराओं में से एक हैं। इनकी उत्पत्ति गुजरात प्रांत के चांदोद और नांदोद नामक नगरों से हुई है। इसीलिए इस जाति को "नाँदारे चौबासा" तथा "चौबीसे गुजराती" भी कहा जाता है।

ये ब्राह्मण मूलतः द्रविड ब्राह्मणों की पाँच शाखाओं में से गुजर शाखा से संबंधित हैं। विन्ध्याचल के दक्षिण में बसने वाले द्रविड ब्राह्मणों की पाँच जातियाँ थीं:

कार्णायकाश्च तैलंगाश्च द्राविडा महाराष्ट्रकाः।
गुजराश्चेति पंचैव द्राविडा विन्ध्यदक्षिणि।।
कर्नाटक, तेलंग, द्रविड, महाराष्ट्र और गुजर — ये पाँच द्रविड ब्राह्मण जातियाँ विन्ध्याचल के दक्षिण में निवास करती थीं।

नामकरण का रहस्य: "चौबीसा" नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इस जाति में ठीक २४ गोत्र थे, २४ उपनाम थे, २४ ऋषियों के वंशज थे, और यहाँ तक कि भोजन बनाने के २४ नियम भी थे। गायत्री मंत्र के २४ अक्षरों से भी इनका विशेष संबंध माना जाता है।

अध्याय ०२

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

मिश्र बंधुओं के अनुसार — प्रथम ब्राह्मण एक ही जाति के थे, फिर वे गौड और द्रविड — दो भागों में विभाजित हुए। गौड ब्राह्मण विन्ध्याचल के उत्तर में और द्रविड ब्राह्मण दक्षिण में निवास करते थे।

सारस्वत: कान्यकुब्जाश्च गौडा उत्कल मैथिलाः।
गौडा इतिख्याता विन्ध्यस्योत्तरवासिनः।।
सारस्वत, कान्यकुब्ज, गौड, उत्कल और मैथिल — ये पाँच गौड ब्राह्मण जातियाँ विन्ध्याचल के उत्तर में रहती थीं।

गुजर ब्राह्मणों का इतिहास: संवत् ९९० के लगभग यह जाति गुजरात में सुसंगठित थी। संवत् ८०३ में वनमाल ने भीलमाल के गुजरों की सहायता से अन्हिल्वाड राज्य स्थापित किया। कुछ इतिहासकारों का मत है कि गुजर ब्राह्मणों और क्षत्रियों का उद्गम इन्हीं गुर्जरों से हुआ है।

संवत् ९७३ में इस राज्य का प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया। परंतु संवत् १९०८ में कश्मीर नरेश सुभटवर्मन ने गुजरात पर भारी आक्रमण करके इस राज्य को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया।

अध्याय ०३

कालक्रम — ऐतिहासिक घटनाएँ

संवत् ७६९
अरबी आक्रमण

अरबी मुसलमानों ने सिंध पर अधिकार जमाया जिसका प्रभाव गुजरात के गुजरों पर भी पड़ने लगा।

संवत् ८०३
अन्हिल्वाड राज्य की स्थापना

वनमाल ने भीलमाल के गुजरों की सहायता से अन्हिल्वाड राज्य स्थापित किया।

संवत् ८५७
राष्ट्रकूट आक्रमण

राष्ट्रकूट नरेश तीसरे गोविंद ने गुजर राज्य को नष्ट कर दिया।

संवत् ९९०
गुजरात में सुसंगठित जाति

चौबीसे ब्राह्मण गुजरात के चांदोद-नांदोद नगरों में सुसंगठित समाज के रूप में स्थापित थे।

संवत् १३५४
अलाउद्दीन का गुजरात विजय अभियान

सम्राट अलाउद्दीन ने मलिक नस्तरत को गुजरात विजय के लिए भेजा। अंतिम हिन्दू नरेश को पराजित किया गया।

संवत् १३५५
गुजरात से पलायन

मुस्लिम अधिकार के बाद अनेक चौबीसे ब्राह्मण मालवा, राजस्थान, बागड़ और मेवाड़ में चले आए।

संवत् १२०० (लगभग)
मेवाड़ नरेश का सम्मान

मेवाड़ के महाराणा ने चौबीसे ब्राह्मणों को पुरोहित बनाया और उन्हें पाँव में सोने के कड़े पहनने का सम्मान दिया।

संवत् १९६४
जाति सम्मेलन

मालवा व गुजरात प्रांत के चौबीसे ब्राह्मणों का महासम्मेलन आयोजित हुआ।

सन् १९२६ ई०
चोबीसा ब्राह्मण फंड की स्थापना

सेलाने में "चोबीसा ब्राह्मण फंड" संस्था की स्थापना — जाति के बच्चों की शिक्षा के लिए।

अध्याय ०४

गुजरात से विस्तार

जब मुसलमानी आक्रमणों के कारण गुजरात में निर्वाह कठिन हो गया, तब चौबीसे ब्राह्मण पूजा-पाठ, ज्योतिष, वैद्यक और पुराण-कथा वाचन करते हुए अन्य प्रांतों में जाकर बसने लगे।

इनका मूल नाम "चौबीसे गुजराती" इस बात का प्रमाण है कि इनकी उत्पत्ति गुजरात से है। यदि इनकी उत्पत्ति मेवाड़ में हुई होती तो इनका नाम "मेवाड़े" होता, परंतु इनका नाम आरंभ से ही "चौबीसे गुजराती" चला आता है।

गुजरात

चांदोद व नांदोद — मूल निवास स्थान। बड़ी सभा और छोटी सभा के दो समूह।

मालवा

होल्कर राज्य सहित मालवा में सर्वाधिक संख्या — लगभग ३,६५० घर।

मेवाड़

राजस्थान के मेवाड़ प्रांत में — सिसोदिया वंश के पुरोहित। लगभग १,००० घर।

बागड़ व हाड़ोती में भी चौबीसे ब्राह्मणों के परिवार बसे हैं। तीनों प्रांतों के जाति भाइयों में एक पंक्ति में बैठकर भोजन करने की परंपरा प्रचलित रही है।

अध्याय ०५

चौबीस गोत्र — नामावली

चतुर्विशाति गोत्राणां प्रवदोम्पहम।
कृष्णात्रेयं च पाराशर, कात्यायन, वत्स, गर्गं।
शांडिल्य, कुशिक, भारद्वाज, गार्ग्यकम।।
चौबीसे ब्राह्मणों के चौबीस गोत्रों का संस्कृत में वर्णन
०१
कृष्णात्रेय
कृष्णात्रेयः, अर्चिः, अजावत्स — श्वेतित्रय (३ प्रवर)
०२
पाराशर
वशिष्टः, सित्थयः, पाराशर — श्वेतित्रय (३ प्रवर)
०३
कात्यायन
कपिलः, कात्यायनः, विश्वामित्रः — श्वेतित्रय (३ प्रवर)
०४
गर्ग
गर्गः, च्यवन, आंगिरस — श्वेतित्रय (३ प्रवर)
०५
शांडिल्य
शांडिल्यः, असितः, देवल — श्वेतित्रय (३ प्रवर)
०६
कुशक
कुशकः, अघमर्षण, विश्वामित्र — श्वेतित्रय (३ प्रवर)
०७
कौशिक
कौशिक, देवराज, विश्वामित्र — श्वेतित्रय (३ प्रवर)
०८
वत्स
वत्सः, च्यवनः, और्वः, अन्नवान, जमदग्नि — श्वेतिपंच (५ प्रवर)
०९
वात्स
वास्त, च्यवन, मौद्गल, जमदग्नि, ईषव — श्वेतिपंच (५ प्रवर)
१०
भारद्वाज
भारद्वाज, आंगिरस, बाहस्पत्य — श्वेतित्रय (३ प्रवर)
११
गार्ग्य
गार्ग्य, च्यवन, आंगिरस, ईष, बाहस्पत्य — श्वेतिपंच (५ प्रवर)
१२
उपमन्यु
उपमन्यु, अतत्थ्य, आंगिरस, भारद्वाज, बाहस्पत्य — श्वेतिपंच (५ प्रवर)
१३
कौंडिन्य
कौंडिन्य, आंगिरस, बाहस्पत्य — श्वेतित्रय (३ प्रवर)
१४
गौतम
गौतम, आंगिरस, उतत्थ्य — श्वेतित्रय (३ प्रवर)
१५
काश्यप
काश्यप, कृच्छतप्त, मानातिः, लोहित, भार्गव — श्वेतिपंच (५ प्रवर)
१६
मांडव्य
मांडव्य, मंडकेश, विश्वामित्र — श्वेतित्रय (३ प्रवर)
१७
चन्द्रात्रेय
चन्द्रात्रेय, वत्स, कृत्स्न — श्वेतित्रय (३ प्रवर)
१८
भार्गव
भार्गव, च्यवन, आन्नुवान, और्व, जमदग्नि — श्वेतिपंच (५ प्रवर)
१९
गालव
तपयक्षा, हारात, उतल्पित, गालव, जयंत — श्वेतिपंच (५ प्रवर)
२०
विष्णुवृद्ध
पौतुम्यु, उत्पुत्र, सदस्य — श्वेतित्रय (३ प्रवर)
२१
मृदगल
मौद्गल, आंगिरस, बाहस्पत्य — श्वेतित्रय (३ प्रवर)
२२
मौनस
मौनस, भार्गव, वैतष्ठस — श्वेतित्रय (३ प्रवर)
२३
वार्ढि
दालम्य, वार्ढि, बाहस्पत्य — श्वेतित्रय (३ प्रवर)
२४
अत्रि
अत्रि, गाविच्छ, पूर्वातित्थ्य — श्वेतित्रय (३ प्रवर)
अध्याय ०६

प्रांतीय शाखाएँ व उपजातियाँ

मूल चौबीसे ब्राह्मण समाज से समय के साथ विभिन्न प्रांतों में बसने के कारण अनेक शाखाएँ विकसित हुईं। सभी शाखाओं में वही चौबीस गोत्र प्रचलित हैं।

चौबीसे गुजराती
गुजरात (बड़ौदा राज्य)

मूल जाति — चांदोद-नांदोद निवासी। बड़ी सभा और छोटी सभा के दो समूह।

चौबीसे मालवी
मालवा, होल्कर राज्य

सर्वाधिक जनसंख्या। मालवा में पूजा-पाठ और ज्योतिष कार्य में प्रसिद्ध।

भट्ट मेवाड़े
भट्टहरपुर, मेवाड़

मेवाड़ नरेश के निमंत्रण पर यज्ञ हेतु आए और वहीं बस गए।

नागर मेवाड़े
नागर नगर, मेवाड़

नाग वंश की रक्षा के लिए बसाए गए — भगवान शिव के आदेश से।

भयहर मेवाड़े
मेवाड़ प्रांत

मेवाड़ प्रांत में बसे चौबीसे ब्राह्मणों की एक शाखा।

पच्चीसे ब्राह्मण
विभिन्न प्रांत

चौबीसे ब्राह्मणों से अलग हुए — इनकी जाति अब अलग मानी जाती है।

अध्याय ०७

पुराण कथा — आस्तिक मुनि

चौबीसे ब्राह्मणों का महाभारत काल से भी संबंध है। महर्षि जरत्कारू, जो विष्णुवृद्ध गोत्र के चौबीसे ब्राह्मण थे, उनके पुत्र आस्तिक मुनि का उल्लेख महाभारत में मिलता है।

राजा जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए सर्पसत्र यज्ञ किया। इस यज्ञ में सभी नाग यज्ञकुंड में आहुति होने लगे। तब आस्तिक मुनि ने आकर राजा जनमेजय को मोहित किया और तक्षक तथा इंद्र को मुक्त कराया।

शिव का आदेश: भगवान शिव ने तक्षक (वासुकी) को आदेश दिया — "उस नगर में चोबीसे ब्राह्मणों का निवास कराओ — वे मेरे भक्त हैं, उनकी सेवा करो, उनके आशीर्वादों से तुम्हारा कल्याण होगा।"

शिव ने उस नगर के तीन नाम बताए: दानपुर (क्योंकि वहाँ ब्राह्मणों को दान मिला), नागर (क्योंकि नाग वंश वहाँ आए) और नागर (क्योंकि ब्राह्मण वैदिक मंत्रों से नागों की रक्षा करेंगे)।

इस प्रकार भट्टहरपुर के चौबीसे ब्राह्मणों में से आस्तिक मुनि का जन्म हुआ जिन्होंने नाग जाति की रक्षा की — यही चौबीसे ब्राह्मणों की पुराण-कालीन महिमा है।

अध्याय ०८

चौबीस उपनाम / अटक

जिस प्रकार गोत्र चौबीस हैं, उसी प्रकार इस जाति के उपनाम (अटक/अवेदक) भी परंपरागत रूप से चौबीस रहे हैं:

विजयवत हांडा जोशी ओझा राव नेर भट्ट पुरोहित बोहरा पाठक सोती राणावत सेठ बाणां रजावंत मोटी दामब्या देरारी पाटनी उपाध्याय तिवारी पाठक मिठायकर औंकारजी
अध्याय ०९

ब्राह्मण धर्म — षट्कर्म एवं गुण

अध्यापनाध्ययन यजने याजन तथा।
दान प्रतिग्रहश्च षट् कर्म ब्राह्मणस्य।।
पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना और दान लेना — ये ब्राह्मण के छः कर्म हैं।
अध्ययन-अध्यापन

वेद, शास्त्र और ज्ञान का स्वयं पठन व दूसरों को शिक्षण

यजन-याजन

यज्ञ स्वयं करना और दूसरों से कराना — धर्म पालन

दान-प्रतिग्रह

दान देना और सत्पात्र से दान ग्रहण करना

नव गुण

शम, दम, तप, शौच, क्षांति, आनव, ज्ञान, विज्ञान, आस्तिक्य

संस्कार

सूर्योदय पूर्व जागरण, संध्यावंदन, ब्रह्मचर्य पालन

चार आश्रम

ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम का पालन

अध्याय १०

जनसंख्या विवरण (संवत् १९९२ के अनुसार)

प्रकाशन काल (संवत् १९९२) में चौबीसे ब्राह्मणों की जनसंख्या का अनुमानित विवरण:

३,६५०+
मालवा
घर
१,०००+
मेवाड़
घर
३९०+
गुजरात
घर
२००+
कोटा-बूंदी
घर
१०,०००+
कुल अनुमानित
जनसंख्या

टिप्पणी: यह आँकड़ा लगभग संवत् १९९२ (सन् १९३५ ई०) के हैं। वर्तमान में चौबीसा समाज की जनसंख्या इससे कई गुना अधिक है और सम्पूर्ण भारत में फैली हुई है।

स्रोत: "चौबीसा ब्राह्मणों की उत्पत्ति — एक पुरानी धरोहर" | लेखक: हरिशंकर पाण्डेय विशारद, चचोर परगना रामपुरा, होल्कर स्टेट | प्रकाशक: पंडित मुकुन्दराम औंकारजी चौबीसे, नया बाजार धार | प्रकाशन: संवत् १९९२, आनन्द सागर स्टीम प्रेस, दरबार धार | यह सामग्री उक्त ऐतिहासिक ग्रंथ पर आधारित है और शैक्षणिक उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है।